काठमांडू: 26 अगस्त को नेपाल और चीन की सीमा से लगे हिमालयी इलाके में आई विनाशकारी बाढ़ ने हजारों परिवारों की जिंदगी बदल दी। ग्लेशियर के ढहने से शुरू हुए मलबे और पानी के तेज बहाव ने नदियों के किनारे बसे इलाकों में घरों, बाजारों, सड़कों, पुलों और हाइड्रोपावर परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया। शुरुआती झटके के बाद सामने आईं लोगों की कहानियां इस आपदा की भयावहता को बयां करती हैं।
कहीं लोगों को भागने तक का मौका नहीं मिला तो कहीं परिवार के सदस्य एक-दूसरे का हाथ पकड़कर बचने की कोशिश करते रहे। कई लोग मलबे में फंस गए और कुछ ने पेड़ों या ऊंची जगहों का सहारा लेकर अपनी जान बचाई।
‘पत्नी का हाथ पकड़कर छत पर ले जाना चाहता था, लेकिन वह बह गई’
68 वर्षीय केशव प्रसाद बराल के लिए बाढ़ का वह पल आज भी आंखों के सामने है। उनके मुताबिक अचानक कीचड़ और मलबे का विशाल बहाव उनके घर की तरफ आने लगा।
उन्होंने बताया कि जैसे-जैसे मलबा करीब आता गया, उसकी ऊंचाई बढ़ती गई। उन्होंने अपनी पत्नी का हाथ पकड़कर उसे घर की छत तक पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन तेज बहाव उनकी पत्नी को अपने साथ ले गया।
कई घंटे बाद हेलीकॉप्टर की मदद से केशव को वहां से निकाला गया। उनकी पत्नी का अब तक पता नहीं चल पाया है।
‘मेरे परिवार को मेरी आंखों के सामने पानी बहा ले गया’
नुवाकोट की कार्पना मल्ला ने बताया कि उनके परिवार के कई सदस्य उनकी आंखों के सामने बाढ़ में बह गए। उनके मुताबिक उनके माता-पिता, बहन और बहन के बच्चे इस आपदा में लापता हो गए।
कार्पना और उनका बेटा किसी तरह एक घर की छत तक पहुंचने में सफल रहे। उनके बेटे सुगम ने अपनी मां का हाथ पकड़ा और उन्हें सुरक्षित जगह तक पहुंचाया।
इससे पहले सुगम ने अपनी बहन को फोन दिया था ताकि वह मदद के लिए किसी से संपर्क कर सके। लेकिन बाद में बहन का फोन बंद हो गया और उसका पता नहीं चल सका।
‘आम का पेड़ नहीं होता तो मैं मर जाता’
बिदुर में काम कर रहे 24 वर्षीय बिबेक कुमाल भी इस बाढ़ की चपेट में आए। वह एक निर्माण स्थल पर गड्ढा खोद रहे थे, तभी उन्हें अचानक तेज आवाज सुनाई दी।
साथ काम कर रहे लोगों ने उन्हें भागने के लिए कहा। बिबेक के मुताबिक उन्होंने दौड़ने की कोशिश की, लेकिन कुछ ही समय बाद पानी, कीचड़ और मलबे का तेज बहाव उन्हें अपने साथ ले गया।
बहते हुए वह एक आम के पेड़ में फंस गए। इसी पेड़ की वजह से उनकी जान बच सकी। बिबेक का कहना है कि अगर वह पेड़ नहीं मिलता तो वह भी बह जाते।
‘कुछ ही पलों में पूरा बाजार गायब हो गया’
रसुवा में तैनात कस्टम अधिकारी राजेंद्र ढुंगाना ने भी तबाही का मंजर देखा। उनके मुताबिक अचानक जमीन हिलती हुई महसूस हुई। बाहर आने पर उन्होंने एक विशाल पानी और मलबे का बहाव अपनी ओर आते देखा।
उनके अनुसार कुछ ही समय में पूरा बाजार इसकी चपेट में आ गया। कस्टम चौकी के आसपास खड़े सैकड़ों वाहन और ट्रक भी बह गए।
‘फसल, अनाज और जानवर सब कुछ चला गया’
बाढ़ ने केवल लोगों के घर और दुकानें ही नहीं छीनीं, बल्कि ग्रामीणों की आजीविका भी तबाह कर दी।
गोमा पंडित ने बताया कि उनके खेत, पशु और जमा किया हुआ अनाज सब बाढ़ में बह गया। उनके मुताबिक भैंस समेत कई जानवरों का भी पता नहीं चला।
उन्होंने बताया कि सरसों के बोरे, बड़ी मात्रा में मक्का और धान भी पानी के साथ बह गए। उनके पास अपनी मेहनत से जुटाई गई संपत्ति में कुछ खास नहीं बचा।
‘लोग भाग रहे थे और चीख रहे थे’
त्रिशूली बाजार के एक व्यापारी ने बताया कि प्रशासन की ओर से लोगों को ऊंची जगहों पर जाने की चेतावनी दी गई थी। बताया गया था कि भोटेकोशी नदी के इलाके में पानी का बड़ा बहाव आ रहा है।
इसके बाद बाजार में अफरा-तफरी मच गई। लोग सुरक्षित जगहों की तरफ भागने लगे, लेकिन कई लोगों को संभलने या दूर जाने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाया।
व्यापारी के मुताबिक उनका 18 वर्षीय बेटा और पत्नी भी लापता हो गए।
‘ऐसी आवाज आई जैसे कोई बड़ा विस्फोट हुआ हो’
रसुवा के स्वास्थ्यकर्मी तुला बहादुर बीके ने बताया कि आपदा अचानक आई। उन्होंने कहा कि पहले बेहद तेज आवाज सुनाई दी और इसके बाद लोग डरकर इधर-उधर भागने लगे।
उनके मुताबिक नदी के आसपास बसे कई इलाकों में भारी तबाही हुई और कई बस्तियां मलबे में दब गईं।
यह आपदा कैसे आई?
26 अगस्त को हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटकर नीचे गिरा। इसके साथ बर्फ, चट्टान और मलबा नदी तंत्र में पहुंचा और तेज फ्लैश फ्लड का रूप ले लिया। शुरुआती तौर पर इसे भूकंप से जोड़कर देखा गया था, लेकिन बाद में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने बताया कि दर्ज हुई भूकंपीय ऊर्जा ग्लेशियर और चट्टानों के गिरने से पैदा हुई थी।
बाढ़ ने नेपाल के अलावा चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी भारी नुकसान किया। रास्ते, पुल, घर और हाइड्रोपावर परियोजनाएं इसकी चपेट में आईं।
आंकड़ों से कहीं बड़ी है तबाही
आपदा के शुरुआती दिनों में मृतकों और लापता लोगों की संख्या तेजी से बढ़ती रही। 26 अगस्त की शुरुआती रिपोर्टों में नेपाल-चीन सीमा क्षेत्र में कम से कम 165 मौतों और करीब 1,500 लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई थी।
लेकिन 16 सितंबर तक नेपाल में कम से कम 1,399 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी थी और करीब 5,200 लोग अब भी लापता बताए गए हैं। इनमें 636 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। अधिकारियों ने बड़ी संख्या में अज्ञात शवों के डीएनए नमूने भी लिए हैं, क्योंकि कई शवों की पहचान अभी तक नहीं हो पाई है।
भारत समेत कई देशों के नागरिक भी इस आपदा के बाद लापता लोगों की सूची में शामिल रहे हैं। आपदा के शुरुआती दिनों में 177 भारतीयों के लापता होने की जानकारी भी सामने आई थी।
अभी भी जारी है तलाश
आपदा के कई दिन बाद भी राहत और बचाव अभियान जारी है। हेलीकॉप्टर, ड्रोन और विशेष बचाव दल मलबे में फंसे लोगों और शवों की तलाश कर रहे हैं। पहाड़ी इलाकों में भारी मलबा, क्षतिग्रस्त सड़कें और मुश्किल भौगोलिक परिस्थितियां अभियान को चुनौतीपूर्ण बना रही हैं।
इस त्रासदी में कुछ ऐसे लोग भी बचाए गए जिन्होंने कई दिनों तक बेहद मुश्किल परिस्थितियों में जिंदगी की लड़ाई लड़ी। सितंबर की शुरुआत में Upper Trishuli 3A हाइड्रोपावर स्टेशन की सुरंग से संजय साह और कबीर महारजन को नौ दिन बाद जिंदा निकाला गया था।
नेपाल में बाढ़ का पानी भले कई इलाकों से उतर गया हो, लेकिन जिन परिवारों के अपने अब भी लापता हैं, उनके लिए इंतजार और तलाश की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।
Zaman Times