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मिडिल ईस्ट संकट की मार, रोजगार पर असर; प्रेस और धुलाई सेवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी

 

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब भारत में घरेलू और छोटे स्तर के रोजगार पर भी दिखाई देने लगा है। खासकर लॉन्ड्री, कपड़े प्रेस करने और धुलाई सेवाओं से जुड़े कामकाज की लागत में तेजी से बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।

दिल्ली समेत कई बड़े शहरों में सड़क किनारे प्रेस और लॉन्ड्री का काम करने वाले लोगों ने बताया कि एलपीजी गैस, कोयला और केमिकल्स की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण उन्हें मजबूरी में अपने रेट बढ़ाने पड़े हैं।

जानकारी के अनुसार, पहले जहां एक जोड़ी कपड़े प्रेस करने का शुल्क करीब 10 रुपये था, अब यह बढ़कर लगभग 15 रुपये हो गया है। कारोबारियों का कहना है कि कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर और कोयले की कीमतें बढ़ने से उनका खर्च काफी बढ़ गया है।

स्थानीय प्रेस कारोबारियों के मुताबिक, पहले 19 किलो का कमर्शियल सिलेंडर करीब 1800 रुपये में मिलता था, जो अब 2000 रुपये से अधिक कीमत पर उपलब्ध है। इसी तरह कोयले की कीमतों में भी इजाफा हुआ है, जिससे कोयले से चलने वाली प्रेस सेवाओं की लागत बढ़ गई है।

कई वर्षों से इस काम से जुड़े लोगों का कहना है कि बढ़ी हुई लागत के बावजूद ग्राहकों से पूरा भुगतान मिलना मुश्किल हो रहा है। ग्राहकों की ओर से कीमत बढ़ाने पर आपत्ति भी कम ही देखने को मिल रही है, लेकिन कई जगह अब भी पुराने रेट पर ही काम करवाने का दबाव बना हुआ है।

लॉन्ड्री व्यवसाय से जुड़े लोगों ने बताया कि कपड़े धोने में इस्तेमाल होने वाले केमिकल्स के दाम भी दोगुने तक बढ़ गए हैं। पहले जहां प्रति गैलन केमिकल की कीमत लगभग 450 रुपये थी, अब यह बढ़कर 800 रुपये से अधिक हो गई है।

इस कारण एक कपड़े की धुलाई की लागत पहले लगभग 13–15 रुपये थी, जो अब बढ़कर 22–23 रुपये तक पहुंच गई है। कारोबारियों का कहना है कि उन्हें कम से कम 25 रुपये प्रति कपड़ा चार्ज करना चाहिए, लेकिन बाजार में प्रतिस्पर्धा और ग्राहकों की अनिच्छा के कारण वे अब भी कम दरों पर सेवा देने को मजबूर हैं।

कई लॉन्ड्री संचालकों ने यह भी बताया कि उनके पास सांसदों, अधिकारियों और बड़े घरानों से भी कपड़े धुलने आते हैं, लेकिन रेट बढ़ाने पर वे ग्राहक किसी और विकल्प की बात करने लगते हैं, जिससे व्यवसायियों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।

कुल मिलाकर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे तनाव और उससे जुड़ी महंगाई का असर अब सीधे तौर पर भारत में छोटे रोजगार और दैनिक सेवाओं पर भी पड़ने लगा है।

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