हिमालयी क्षेत्र में तेजी से बदलते मौसम और ग्लेशियरों के पिघलने के बीच लद्दाख प्रशासन ने एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय पहल शुरू की है। चांगथांग क्षेत्र में करीब 15,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित त्सो कार झील को दोबारा जीवंत करने के लिए पानी को दूसरे प्राकृतिक स्रोत से जोड़ने की योजना पर काम शुरू किया गया है।
इस परियोजना का उद्देश्य ग्लेशियर से मिलने वाले पानी को प्राकृतिक ढलान और साधारण जल संरचनाओं के जरिए त्सो कार तक पहुंचाना है। प्रशासन को उम्मीद है कि परियोजना पूरी होने के बाद झील के जलस्तर में सुधार होगा और आसपास का पारिस्थितिक तंत्र भी दोबारा मजबूत होगा।
लद्दाख के उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना ने इस पहल को ऊंचाई वाले ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। उनके मुताबिक, ग्लेशियर के पानी को झील तक पहुंचाने के लिए प्राकृतिक प्रवाह का इस्तेमाल किया जा रहा है।
तेजी से सिकुड़ रही थी त्सो कार झील
त्सो कार कभी करीब 11,000 एकड़ क्षेत्र में फैली हुई बताई जाती थी। पिछले कुछ वर्षों में इसके आकार में भारी कमी आई है और अब इसका क्षेत्रफल करीब 3,200 एकड़ तक रह गया है।
झील के सिकुड़ने का असर केवल पानी तक सीमित नहीं रहा। इसके आसपास रहने वाले पश्मीना बकरी पालकों के लिए चरागाह कम होते गए, जबकि प्रवासी पक्षियों के आवास पर भी इसका प्रभाव पड़ा है।
स्थानीय स्तर पर यह चिंता भी सामने आई कि जल क्षेत्र के घटने से यहां आने वाले प्रवासी पक्षियों की संख्या कम हो रही है। इनमें दुर्लभ ब्लैक-नेक्ड क्रेन भी शामिल हैं।
ग्लेशियर के पानी को झील तक पहुंचाने की योजना
प्रशासन ने त्सो कार को दोबारा पानी से भरने के लिए 18,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित रूपशो खर्नक धारा के पानी का उपयोग करने की योजना बनाई है।
इसके लिए करीब 11.5 किलोमीटर लंबी मिट्टी की नहर तैयार की जा रही है। योजना के अनुसार, ग्लेशियर से आने वाले पानी को प्राकृतिक गुरुत्वाकर्षण प्रवाह के जरिए त्सो कार की दिशा में ले जाया जाएगा।
बताया गया है कि इस प्रणाली के जरिए करीब 320 मिलियन लीटर पानी तक पहुंचाने की क्षमता विकसित की जा रही है।
पहले तीन प्राकृतिक जलाशय भरेंगे
त्सो कार तक पानी सीधे पहुंचाने के बजाय रास्ते में मौजूद तीन प्राकृतिक गड्ढों को पहले जलाशय के रूप में विकसित किया जा रहा है। इनकी क्षमता क्रमशः करीब 270 एकड़, 24 एकड़ और 10 एकड़ क्षेत्र में फैली बताई गई है।
इन तीनों जल संरचनाओं में कुल मिलाकर लगभग 1,230 मिलियन लीटर पानी जमा होने की संभावना है। अधिकारियों के मुताबिक, इन जलाशयों के भरने के बाद अतिरिक्त पानी मुख्य त्सो कार झील की ओर पहुंचेगा।
इस व्यवस्था का एक फायदा यह भी होगा कि पानी के साथ आने वाली गाद और मिट्टी पहले इन्हीं जलाशयों में रुक सकती है। इससे अपेक्षाकृत साफ पानी झील तक पहुंचने की उम्मीद है।
चार दिन में दिखा शुरुआती असर
अधिकारियों के अनुसार, 9 सितंबर से करीब 20 क्यूसेक पानी को पहले प्राकृतिक तालाब की ओर मोड़ने का काम शुरू किया गया था। शुरुआती दिनों में ही इसमें पानी जमा होना शुरू हो गया।
प्रशासन का अनुमान है कि जलाशयों के भरने के बाद अक्टूबर के पहले सप्ताह तक अतिरिक्त पानी मुख्य त्सो कार झील तक पहुंच सकता है। परियोजना का व्यापक लक्ष्य अक्टूबर 2027 तक झील को पहले की स्थिति के करीब लाना है।
तीन नए वेटलैंड से बढ़ेगा पर्यावरणीय लाभ
इस परियोजना को केवल त्सो कार को पानी उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं माना जा रहा है। रास्ते में बनाए जा रहे तीन जलाशय भविष्य में मीठे पानी की आर्द्रभूमि के रूप में विकसित हो सकते हैं।
इनसे आसपास के क्षेत्र में नए जलीय और घास वाले आवास बनने की संभावना है। इससे प्रवासी पक्षियों को भी नए ठिकाने मिल सकते हैं।
लेह-मनाली हाईवे के नजदीक होने के कारण ये जलाशय भविष्य में पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं। इस तरह परियोजना से जल संरक्षण के साथ पर्यटन और स्थानीय जैव विविधता को भी लाभ मिलने की उम्मीद है।
पश्मीना चरवाहों को भी मिलेगा फायदा
त्सो कार के आसपास रहने वाले कई स्थानीय परिवार पश्मीना बकरी पालन पर निर्भर हैं। झील और आसपास के घास के मैदानों के सिकुड़ने से चरवाहों को अपने पशुओं के लिए नए चरागाह तलाशने पड़ रहे हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, कुछ पश्मीना पालकों को चरागाहों की तलाश में 50 से 75 किलोमीटर तक दूर जाना पड़ता है। अगर झील के आसपास पानी और घास के मैदान दोबारा विकसित होते हैं, तो इन परिवारों को काफी राहत मिल सकती है।
प्रशासन को उम्मीद है कि परियोजना के सफल होने पर स्थानीय चरागाहों में सुधार होगा, पश्मीना पालन को मजबूती मिलेगी और लोगों को अपने मूल क्षेत्रों के आसपास ही आजीविका के अवसर मिल सकेंगे।
कम लागत वाले मॉडल पर काम
इस परियोजना की एक खास बात यह बताई जा रही है कि इसमें बड़े पैमाने पर महंगे निर्माण के बजाय प्राकृतिक ढलान, मिट्टी की नहर और मौजूदा जल संरचनाओं का इस्तेमाल किया जा रहा है।
फिलहाल जल प्रवाह से जुड़े काम के लिए जेसीबी जैसी मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रशासन इसे ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्र में कम लागत वाले जल प्रबंधन और पर्यावरण बहाली के एक मॉडल के तौर पर देख रहा है।
अगर योजना सफल रहती है, तो त्सो कार झील का पुनर्जीवन न केवल लद्दाख के जल संसाधनों के लिए महत्वपूर्ण होगा, बल्कि ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में घटते जल स्रोतों और बदलती जलवायु से निपटने के लिए दूसरे इलाकों को भी एक व्यावहारिक मॉडल मिल सकता है।
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