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उम्रकैद पर सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट राय, मौत तक जेल में रखना संवैधानिक

 

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी दोषी को उसकी प्राकृतिक मृत्यु तक जेल में रखने की सजा भारतीय संविधान के अनुरूप है। अदालत ने कहा कि यदि किसी फैसले में स्पष्ट रूप से बिना किसी छूट के आजीवन कारावास का आदेश दिया गया है, तो इसका अर्थ है कि दोषी अपनी अंतिम सांस तक जेल में रहेगा।

यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने आजीवन कारावास की ऐसी सजा पाए छह दोषियों की याचिकाओं को खारिज करते हुए की। इन याचिकाओं में अदालत से सजा में छूट या रिहाई के प्रावधानों का लाभ देने की मांग की गई थी।

याचिकाकर्ताओं की क्या थी दलील?

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि हत्या के मामलों में लागू भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत केवल मृत्युदंड या आजीवन कारावास का प्रावधान है। उनका तर्क था कि कानून में “प्राकृतिक जीवन के अंत तक बिना छूट के कारावास” का अलग से उल्लेख नहीं है। इसलिए आजीवन कारावास भुगत रहे दोषियों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत रिहाई के लिए आवेदन करने का अवसर मिलना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि प्राकृतिक मृत्यु तक कारावास की सजा भारतीय न्याय व्यवस्था में पहले से स्थापित कानूनी सिद्धांत है और यह पूरी तरह संवैधानिक है।

पीठ ने अपने फैसले में कहा कि वर्ष 2016 में संविधान पीठ द्वारा दिए गए ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम वी. श्रीहरन’ फैसले में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट विशेष परिस्थितियों में मृत्युदंड के विकल्प के रूप में ऐसी सजा दे सकते हैं, जिसमें दोषी को जीवनभर जेल में रहना होगा और सामान्य सजा में छूट का लाभ नहीं मिलेगा।

सजा में छूट पर भी अदालत ने दी स्पष्टता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी निर्णय में “बिना किसी छूट के आजीवन कारावास” का उल्लेख है, तो संबंधित राज्य सरकार सामान्य कानूनी प्रावधानों के तहत उस सजा को कम या माफ नहीं कर सकती।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 72 और अनुच्छेद 161 के तहत क्रमशः राष्ट्रपति और राज्यपाल को प्राप्त दया याचिका या क्षमादान संबंधी संवैधानिक शक्तियां इस फैसले से प्रभावित नहीं होंगी।

अदालत ने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर पहले ही संविधान पीठ स्पष्ट निर्णय दे चुकी है, इसलिए बार-बार उसी कानूनी प्रश्न को चुनौती देना न्यायिक प्रक्रिया का अनावश्यक दुरुपयोग माना जाएगा।

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