संसद के बजट सत्र के दौरान ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारत की भागीदारी को लेकर लोकसभा में चर्चा हुई। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने केंद्र सरकार से इस परियोजना पर सवाल पूछते हुए अमेरिकी प्रतिबंधों के संभावित प्रभावों पर चिंता जताई।
मनीष तिवारी ने विदेश मंत्री से जानना चाहा कि क्या अमेरिका द्वारा दोबारा लागू या बढ़ाए गए प्रतिबंधों के खतरे को देखते हुए सरकार ने चाबहार पोर्ट परियोजना में भारत की रणनीतिक, वित्तीय और परिचालन भूमिका की समीक्षा की है। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या भारतीय कंपनियों, विशेष रूप से इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL), को संभावित द्वितीयक प्रतिबंधों से बचाने के लिए कोई विशेष कदम उठाए गए हैं।
इसके अलावा, उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या चाबहार परियोजना से जुड़े किसी भारतीय अधिकारी या प्रतिनिधि को प्रबंधन या निर्णय-निर्धारण की भूमिका से हटाया गया है। साथ ही उन्होंने अफगानिस्तान, मध्य एशिया और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) तक भारत की पहुंच पर इसके दीर्घकालिक असर को लेकर सरकार का रुख जानना चाहा।
जवाब में केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने कहा कि चाबहार बंदरगाह परियोजना अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण, आर्थिक विकास और मध्य एशिया के साथ भारत के व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। उन्होंने बताया कि एक भारतीय कंपनी IPGL ने अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक इकाई के माध्यम से वर्ष 2018 में बंदरगाह का संचालन संभाला था।
विदेश राज्य मंत्री ने जानकारी दी कि मई 2024 में ईरान के बंदरगाह और समुद्री संगठन के साथ चाबहार बंदरगाह के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के उपकरण और संचालन के लिए 10 वर्षों का समझौता किया गया। इस समझौते के तहत भारत ने बंदरगाह उपकरणों की खरीद के लिए 1.2 अरब डॉलर के निवेश की अपनी प्रतिबद्धता पूरी कर दी है।
उन्होंने आगे बताया कि सितंबर 2025 में अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण से जुड़ी प्रतिबंध छूट को रद्द किया गया था, लेकिन बाद में बातचीत के बाद सीमित शर्तों के साथ इस छूट को अप्रैल 2026 तक बढ़ाया गया। सरकार इन घटनाक्रमों के प्रभावों का आकलन कर रही है और सभी संबंधित पक्षों के साथ संपर्क में है ताकि भारत के रणनीतिक हितों की रक्षा की जा सके।
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