सुल्तानपुर में मंगलवार से लोक आस्था का महापर्व डाला छठ का आगाज हो गया है। पौराणिक स्थल सीताकुंड घाट इस अवसर पर पूरी तरह सज गया है। घाट पर पूजा बेदियों की संख्या में इजाफा हुआ है, जिससे श्रद्धालुओं की आस्था और श्रद्धा झलक रही है।
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प्रशासन ने सुरक्षा के मद्देनजर गोमती तट पर बैरिकेडिंग की व्यवस्था की है ताकि श्रद्धालुओं को कोई परेशानी न हो। आज नहाय-खाय के बाद श्रद्धालु खरना का पर्व मनाएंगे, जबकि 7 नवम्बर को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्ध्य और 8 नवम्बर को उगते सूर्य को अर्ध्य दिया जाएगा।
भगवान भास्कर की आराधना का यह पर्व, जिसे डाला छठ या सूर्यषष्ठी भी कहा जाता है, कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है। इस बार डाला छठ का महापर्व 7 नवम्बर को मनाया जाएगा। दरअसल, इस व्रत की शुरुआत नहाय-खाय के साथ ही कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से होती है, जो तीन दिवसीय नियम-संयम व्रत के बाद चौथे दिन अरुणोदय काल में भगवान भास्कर को अघ्र्य देकर पारण किया जाता है।
व्रत के दौरान स्वच्छता का विशेष ध्यान
इस व्रत की शुरुआत आज मंगलवार 5 नवम्बर को चतुर्थी, यानी नहाय-खाय वाले दिन से होगी। इस दौरान स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है। पहले दिन घर की साफ-सफाई के बाद स्नान आदि के बाद तामसिक भोजन का त्याग कर, दिन में एक बार भात (चावल) और कद्दू की सब्जी का सेवन किया जाता है। इसके बाद जमीन पर शयन करना आवश्यक होता है।
दूसरे दिन, यानी 6 नवम्बर को खरना मनाया जाता है, जिसमें दिन भर उपवास रखने के बाद सायंकाल गुड़ से बनी खीर का सेवन किया जाता है। तीसरे दिन, यानी डाला छठ पर, श्रद्धालु निराहार रहकर बांस की सूप और डालियों में विभिन्न प्रकार के फल, मिष्ठान, नारियल, ऋतु फल, ईख आदि रखकर किसी नदी, तालाब, पोखरा या बावरी के किनारे दूध तथा जल से अघ्र्य अर्पित करते हैं। इस दिन रात भर जागरण किया जाता है। अंततः दूसरे दिन प्रात: सूर्योदय के समय या अरुणोदय काल में सूर्य देव को अर्ध्य देकर इस पवित्र पर्व का समापन किया जाएगा।
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Zaman Times