कांग्रेस नेता राहुल गांधी की सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में बताई गई तकनीकी कमियों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने इन आपत्तियों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि याचिका में कमियां बताने वाले लोग कानूनी प्रक्रिया को सही तरीके से नहीं समझ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि दस्तावेजों में छोटी-छोटी तकनीकी गलतियों को बड़ा मुद्दा बनाया जा रहा है, जबकि याचिका में उठाए गए मूल सवालों पर चर्चा होनी चाहिए।
दरअसल, राहुल गांधी और विपक्ष के अन्य नेताओं की ओर से दाखिल याचिका को मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं किया गया। इसकी वजह रजिस्ट्री की ओर से बताई गई खामियों का समय पर दूर नहीं होना बताया गया। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, याचिका में कुल 14 कमियां दर्ज की गई थीं।
अभिषेक मनु सिंघवी ने क्या कहा?
अभिषेक मनु सिंघवी ने याचिका में बताई गई तकनीकी खामियों को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अदालत में दाखिल होने वाली याचिकाओं की रजिस्ट्री स्तर पर जांच की जाती है और इस प्रक्रिया में दस्तावेजों से जुड़ी कमियां सामने आ सकती हैं।
सिंघवी के मुताबिक, कुछ लोग इन तकनीकी आपत्तियों को लेकर इस तरह प्रतिक्रिया दे रहे हैं, जैसे इससे याचिका में उठाए गए सभी मुद्दे गलत साबित हो जाते हों। उन्होंने कहा कि केवल कॉमा, फुल स्टॉप या फोटोकॉपी की स्पष्टता जैसे सवाल उठाने के बजाय याचिका में लगाए गए आरोपों और उनके आधार पर चर्चा होनी चाहिए।
उन्होंने यह भी सवाल किया कि क्या आपत्तियां उठाने वालों ने याचिका में दर्ज तथ्यों को गलत साबित किया है या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े आरोपों पर कोई ठोस जवाब दिया है। उनका कहना था कि तकनीकी कमियों और याचिका की मूल विषयवस्तु को अलग-अलग नजरिए से देखा जाना चाहिए।
राहुल गांधी की याचिका में क्यों नहीं हुई सुनवाई?
राहुल गांधी और विपक्ष के अन्य नेताओं की ओर से दायर याचिका मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हो सकी। रजिस्ट्री ने याचिका के दस्तावेजों की जांच के दौरान कई तकनीकी और प्रक्रियागत कमियां दर्ज की थीं। निर्धारित प्रक्रिया के तहत इन कमियों को दूर किए जाने के बाद ही मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का रास्ता साफ हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर दर्ज जानकारी के अनुसार, याचिका में कुछ दस्तावेज स्पष्ट नहीं थे, जबकि कुछ पन्नों के अपठनीय या गायब होने की बात भी सामने आई। इसके अलावा याचिकाकर्ताओं से संबंधित दस्तावेजों में भी कमियां बताई गईं।
याचिका में बताई गईं 14 तकनीकी खामियां
रजिस्ट्री की ओर से दर्ज आपत्तियों में दस्तावेजों और कानूनी औपचारिकताओं से जुड़ी कई समस्याएं शामिल थीं। इनमें प्रमुख रूप से निम्न बिंदु बताए गए:
- याचिका में कुछ पक्षकारों को नाम के आधार पर प्रतिवादी बनाया जाना।
- संबंधित पुराने न्यायिक फैसले की प्रति संलग्न नहीं होना।
- नौ याचिकाकर्ताओं के वकालतनामे उपलब्ध नहीं होना।
- कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के पहचान पत्र की स्पष्ट प्रति नहीं होना।
- कुछ पन्नों का अपठनीय होना या दस्तावेजों में पन्नों का गायब होना।
- निर्धारित कोर्ट फीस में 220 रुपये की कमी होना।
ये आपत्तियां याचिका की फाइलिंग और दस्तावेजों से जुड़ी बताई गई हैं। इन्हें दूर करना मामले की सुनवाई की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है।
मल्लिकार्जुन खरगे के पहचान पत्र पर भी उठी आपत्ति
रजिस्ट्री ने याचिका के सह-याचिकाकर्ताओं से जुड़े दस्तावेजों की जांच के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के पहचान पत्र की प्रति को स्पष्ट नहीं पाया। इसके अलावा याचिका के कुछ पन्नों की पठनीयता को लेकर भी आपत्ति दर्ज की गई।
अदालत में याचिका दाखिल करते समय सभी जरूरी दस्तावेजों, पहचान पत्रों और वकालतनामों का नियमानुसार उपलब्ध होना आवश्यक होता है। यदि इनमें कोई कमी रहती है, तो उसे दूर करने के लिए संबंधित पक्ष को निर्देश दिए जा सकते हैं।
कोर्ट फीस में 220 रुपये की कमी का भी मामला
याचिका से जुड़ी आपत्तियों में कोर्ट फीस का मुद्दा भी शामिल था। रजिस्ट्री के अनुसार, निर्धारित शुल्क की तुलना में 220 रुपये कम जमा किए गए थे। इसके अलावा कुछ अन्य दस्तावेजी औपचारिकताओं को भी पूरा करने की जरूरत बताई गई।
ऐसी प्रक्रियागत आपत्तियों को दूर करने के बाद ही मामला सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। हालांकि, केवल तकनीकी कमियां दर्ज होने से याचिका में उठाए गए मूल मुद्दों पर अदालत का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।
तकनीकी खामियों और मूल आरोपों के बीच क्या है अंतर?
इस मामले में एक ओर सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री की ओर से याचिका के दस्तावेजों में कमियां बताई गई हैं, वहीं दूसरी ओर अभिषेक मनु सिंघवी ने इन आपत्तियों को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया दी है। सिंघवी का तर्क है कि दस्तावेजी कमियों को याचिका की विषयवस्तु से अलग करके देखा जाना चाहिए।
फिलहाल, मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करेगी कि याचिकाकर्ता रजिस्ट्री की ओर से बताई गई कमियों को किस तरह दूर करते हैं और याचिका सुनवाई के लिए कब सूचीबद्ध होती है।
Zaman Times