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दिल्ली हाई कोर्ट ने BSF पर सख्ती दिखाई—कहा, दिव्यांग बेटे की देखभाल के कारण ट्रांसफर से मना करना गलत नहीं माना जा सकता।

 

दिल्ली हाई कोर्ट ने सीमा सुरक्षा बल (BSF) की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी अधिकारी के दिव्यांग बच्चे से जुड़ी सुविधाओं को उसकी नौकरी और अच्छी सैलेरी के आधार पर नकारा नहीं जा सकता है. कोर्ट ने इसे कानून और मानवीय दृष्टिकोण दोनों के खिलाफ बताया.

दिल्ली हाई कोर्ट ने गृह मंत्रालय के नियम का दिया हवाला

दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की बेंच ने कहा कि गृह मंत्रालय के ऑफिस नियम के मुताबिक, दिव्यांग बच्चे के देखभालकर्ता कर्मचारी को ट्रांसफर से छूट मिल सकती है और इसमें बार-बार लाभ लेने की कोई सीमा तय नहीं है. यह सुविधा तब तक मिलती रहेगी जब तक बच्चा दिव्यांग है और देखभाल की जरूरत है. अदालत ने साफ कहा कि यह नीति कर्मचारी के फायदे के लिए नहीं, बल्कि दिव्यांग बच्चे के हित में है. प्रशासनिक वजहों से ही ट्रांसफर किया जा सकता है, लेकिन ऐसी स्थिति में विभाग को ठोस और गंभीर कारण बताने होंगे.

दिल्ली हाई कोर्ट ने दिया अहम निर्देश

दिल्ली हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए बीएसएफ को निर्देश दिया कि अधिकारी को दिल्ली में तैनात किया जाए या फिर प्रशासनिक मजबूरी बताते हुए एक स्पष्ट और तर्कसंगत आदेश जारी किया जाए. दिल्ली हाई कोर्ट ने बीएसएफ को इस मामले में फैसला लेने के लिए अहम आदेश जारी किया.

क्या है पूरा मामला?

दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल याचिका के मुताबिक, यह मामला BSF के एक अधिकारी से जुड़ा है, जिन्होंने अपने 50 प्रतिशत लोकोमोटर डिसेबिलिटी से पीड़ित बेटे की देखभाल के लिए असम के सिलचर से दिल्ली या किसी मेट्रो शहर में ट्रांसफर की मांग की थी. अधिकारी का बेटा दोनों पैरों से स्थायी रूप से दिव्यांग है, दफ्तर आने-जाने में असमर्थ है और वर्क फ्रॉम होम कर रहा है. इलाज और बेहतर सुविधाओं के लिए दिल्ली जैसी जगह जरूरी बताई गई थी.

बीएसएफ ने ट्रांसफर से यह कहकर इनकार कर दिया कि अधिकारी का बेटा एक नामी कंपनी में काम करता है और उसकी सैलरी अच्छी है. बीएसएफ की तरफ से दिए गए इस हाई कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि यह तो गर्व की बात है कि दिव्यांग होकर भी युवक ने नौकरी हासिल की, लेकिन इसे दिव्यांग अधिकारों से वंचित करने का कारण नहीं बनाया जा सकता है.

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